सोने की चिड़िया कहां जाने वाला, अपने गर्भ में कई प्रकार की विभिन्नताओं वाली सभ्यता को साथ लिए, ऋषि-मुनियों के आदर्श वाला महान भरत का देश वर्तमान में विकासशील पाश्चात्य संस्कृति की चादर ओढ़े भारत अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप को भुला चुका है। इसकी शुरुआत ब्रिटेन को भारत पर अपना अधिकार जताने और इस पर राज करने से भारतीय संस्कृति को खत्म करने पर हुई । पश्चिम का यह प्रभाव भारतीय जीवन शैली में समाज में जाति प्रथा, शिक्षा, संयुक्त परिवार, भौतिक परंपराओं, नैतिक मूल्य, रीति-रिवाजों आदि पर पड़ा है।
किसी भी देश की अपनी संस्कृति होती है उसका अपना एक इतिहास, परंपरा होती है । संस्कृति को अपनी आत्मा के रूप में लिए हुए देश एक ऐसा शरीर है, जिसके अपने मूल्य होते हैं। 16 वी शताब्दी से भारतीय जीवन शैली और धर्म तथा शिक्षा में यूरोपियों तरीकों का प्रसार करने का श्रेय यूरोपी साम्राज्य द्वारा इसका वैश्वीकरण करने से हुआ है। पश्चिमी सभ्यताओं के प्रभाव से भारतीय जीवन शैली के विचारों में एक गंदगी ने अपना स्थान ले लिया है, जो मानव मस्तिष्क पर इस तरह पकड़ बनाए हुए हैं कि वह अपने सामाजिक परिवेश में एक अनुशासन हीन जीवन शैली को महत्व दिए हुए हैं । और इस प्रकार की अर्थहीन, विषैली सभ्यता का प्रसार टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले सिनेमा, विज्ञापन, सीरियल्स, बढ़-चढ़कर समर्थन दिया है।
हमारी मूल मातृभाषा को भी बुला दिया गया है अंग्रेजी भाषा को आजाद ख्यालों वाली भाषा दिखाकर, भारतीय नारी की सम्मानजनक परिभाषा को अर्धनग्न, नशे में लिप्त सिर्फ भोग्य की वस्तु के रूप में बदल दिया गया है ।हमें यह अपने आप से पूछने की जरूरत है कि जहां एक और हम अपने पूर्वजों की संस्कृति को एक आदर्श के रूप में मांगते हैं तो हमारी मानसिकता इतनी कमजोर कैसे हो गई कि हमने अपने वेदों के ज्ञान को बुलाकर अनुशासन हीन, जानवरों की संगति को अपना लिया।
जहां न तो नारी को अपनी देवी स्वरूप मर्यादा याद है, न तो पुरुषों को अपना शौर्य, न तो समाज को अपनी भाषा, धर्म, शिष्टाचार, नैतिक मूल्य और न तो रिश्तो की मूल्य याद है । समाज में सबसे दुख की बात यह है कि धर्म, देश, मनुष्यता को एक विध्वंस की ओर ले जाकर खड़ा कर दिया है और उसे आधुनिकता का नाम दिया है ।
यहां तक कि कई विदेशी जो भारत में आकर भारतीय संस्कृति और भारतीय वेदों का पठन करने के पश्चात इतना प्रभावित हुए कि वे यहीं के होकर रह गए, और उन्होंने अपने देशों में भी जाकर इस ज्ञान को बढ़ाया, जर्मनी जैसे विकसित देश में भी सबसे पहले प्रकाशित होने वाली संस्कृत किताब गीता है ।कई विदेशी विद्वानों ने अपने देशों में कई संस्कृत विश्वविद्यालय खोले गए जिसमें महान वेदों के मूल्यों को समझाया गया है ।
परंतु अपने ही देश में इन महान ऋषियों के देवताओं
से प्राप्त ज्ञान को आज पिछड़ा हुआ माना जाने लगा है, हमें पश्चिमी देशों के रोटी, कपड़ा, मकान की मूलभूत सुविधाओं में इतना अनुकरण कर लिया है कि
जीवन को इससे ऊपर के स्तर देखने के लिए हमारे मस्तिष्क में इच्छा शक्ति नहीं है । हमें पश्चिमी जगत
के इस स्वांग से निकलकर अपनी जड़ों जैसे वेद शास्त्र, नैतिक मूल्य, सामाजिक दर्शन, भारत को विश्व गुरु बनाने वाली विरासत की और पुन: लौटना होगा ।