भारत में राजनीतिक चिंतन
पश्चिमी देशों की राजनीति की तुलना में धार्मिक स्वरूप में अधिक आध्यात्मिक और
नैतिक है । भारतीय राजनीति के इतिहास में
पीछे जाने पर जान पाएंगे कि भारतीय राजनीति लगभग 6000 वर्षों से भी
अधिक प्राचीन सभ्यता में भी बहुत महत्वपूर्ण और गौरवशाली इतिहास रहा है । प्राचीन
भारत में महान सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में महान राजनीतिज्ञ कौटिल्य ने
अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रंथ की रचना की
थी ।
आजाद भारत में भी
भारतीय राजनीति को समृद्ध करने के लिए कई क्रांतिकारियों ने अपने जीवन का योगदान
दिया है , परंतु वर्तमान
समय में भारतीय राजनीति में कई तरह के बदलाव आए हैं । आजादी के बाद से वर्तमान समय
में भारत ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, आज की राजनीति में स्वार्थपरक राजनीति(Selective Politics) ने भी अपना स्थान
लिया है, कई ऐसे लोग के
राजनीति में आने से राजनीति मौकापरस्त हो गई है । हर कोई देश हित के बारे में ना
सोच कर अपने और अपने परिवार, रिश्तेदारों की उन्नति के बारे में सोच रहा है, और यह बात देश के
लोगों से छुपी नहीं है कि यहां वंशवाद ने अपना स्थान ले रखा है ।
राष्ट्रीय स्तर
पर ही नहीं अपितु क्षेत्रीय स्तर पर भी परिवार के स्वार्थ के लिए नेता स्वार्थपरक
राजनीति(Selective Politics) पर उतर आए है, परंतु संपूर्ण
राजनीति को इस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप लगाना उचित नहीं होगा ।देश में संविधान
के अनुसार क्षेत्र के लोगों अपनी क्षेत्रीय, ग्रामीण विकास के
लिए अपने लोगों को चुनने का अधिकार है, ग्राम स्वराज(Gram
Swaraj) में ग्रामीण स्तर पर
पंचायतों के द्वारा अपने अपने क्षेत्र के विकास के लिए अपने-अपने प्रतिनिधियों को
चुनने की आजादी है ।
भारतीय राजनीति
में ग्रामीण परिवेश में भी अपने अपने क्षेत्र की अलग-अलग पार्टी है और उन सभी
पार्टियों का अपना अपना एजेंडा है, बाहरी तौर पर
देखने पर सभी अपने राजनीतिक एजेंडे में अपने क्षेत्र के विकास का दावा करते हैं,
परंतु जब उनके
परिणाम को देखा जाता है तो ज्ञात होता है उनकी पॉलीटिकल एजेंडा(Political Agenda) जातिगत,
धार्मिक और
व्यक्तिगत हो सकते हैं जो भारतीय राजनीति बहुत चिंताजनक विषय है ।
ग्राम स्वराज की
बात करते हैं तो संविधान के अनुसार सिर्फ
ग्रामीण परिवेश को ही अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, परंतु राष्ट्रीय
स्तर की पार्टियों के नेता अपना प्रभाव और अपना राजनीतिक एजेंडा दिखाने के लिए
स्पष्ट रूप से अपना प्रभाव डालते हैं जो
पूर्ण रूप से संविधानिक नहीं है । आज भारत की राजनीति स्वार्थ,
वंशवाद,
धार्मिक,
जातिगत तथा
व्यक्तिगत रूप से बांटने वाली राजनीति का रूप ले लिया है, क्या हम भी
अंग्रेजी राज की तरह फूट डालो राज करो की भावना को लिए सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए
देश को बांटने का काम कर रहे हैं, आने वाली पीढ़ी
को हम किस तरह का भारत देकर जाने वाले हैं हमें इस पर गंभीर रूप से विचार करने की
आवश्यकता है।
इसीलिए भारत के
युवा वर्ग को अपने एक एक वोट की कीमत को समझते हुए सही पॉलीटिकल एजेंडा(Political Agenda) वाले लोग नेता बन सके,
जिससे देश में
सामाजिक एकता तथा आपसी प्रेम का माहौल रहते हुए देश विकास की ओर अग्रसर रह सके ।
देश को बांटने तोड़ने जैसे विचार रखने वाले लोगों, नेताओं तथा
राजनीति पार्टियों को हमें अपना सहयोग देना बंद करना होगा जिस से आने वाली पीढ़ी
को एक स्वस्थ और साफ-सुथरी छवि वाले, जो सिर्फ देश के
विकास के लिए कुछ करना चाहते हैं वे लोग ही राजनीति में आगे बढ़ सके और एक अखंड भारत
का निर्माण हो।